मूलभूत सुधारों की राह देखती नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020




  • प्रो. गीता गाँधी किंगडन एवं अरविन्द पानगढ़िया

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 पर विशेष

34 वर्षों के एक लम्बे अन्तराल के बाद शिक्षा पद्धति में रचनात्मक बदलाव हेतु राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का अस्तित्व में आना एक सुखद अहसास है, बशर्ते यह उन जरूरतों को भी पूरा कर सके, जिनके अभाव में देश के तमाम सरकारी विद्यालय छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने में असमर्थ प्रतीत हो रहे हैं। नई शिक्षा नीति में देश की शिक्षा प्रणाली में आमूल-चूल रचनात्मक बदलाव की रूपरेखा प्रस्तुत की गई है। यह नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति उच्चशिक्षा में बदलाव का पूरा भरोसा दिलाती है, परन्तु प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा के क्षेत्र में मूलभूत सुधारों की राह देखती प्रतीत होती है। हालाँकि इस शिक्षा नीति के कई सकारात्मक पहलू भी हैं, जो भावी पीढ़ी को क्वालिटी परसन बनाने अर्थात गुणात्मक व्यक्तित्व प्रदान करने में सक्षम हैं। तो चलिए, पहले उन रचनात्मक बिन्दुओं पर नजर डालते हैं जो शिक्षा में रचनात्मक बदलाव लाने वाले हैं –
सबसे पहली बात यह कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में 3 से 6 वर्ष की आयु वाले बच्चों की देखभाल एवं उनकी शिक्षा को स्कूली शिक्षा का अभिन्न अंग माना गया है, जो कि सही दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है, क्योंकि बच्चों के मस्तिष्क का अधिकांश भाग 6 वर्ष की आयु तक विकसित हो जाता है, साथ ही, भावी पीढ़ी में जीवन मूल्यों व संस्कारों की नींव रखने का भी यही सही समय है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति का दूसरा सकारात्मक पहलू यह है कि इस शिक्षा नीति में कक्षा-3 तक सभी बच्चों के लिए जरूरी बुनियादी ज्ञान को प्राथमिकता दी गई है। क्योंकि जब जरूरी बुनियादी योग्यता के बगैर बच्चे कक्षा-3 व उससे आगे की कक्षाओं में प्रवेश लेते हैं तो उनके लिए पाठ्यक्रम को समझना कड़ी चुनौती साबित होती है और यही आगे चलकर खराब शैक्षणिक परिणाम के रूप में सामने आता है।
नई शिक्षा नीति में एक अच्छी बात यह भी हे कि इसमें माध्यमिक शिक्षा में विज्ञान, कला व वाणिज्य पाठ्यक्रम के विभाजन को समाप्त करने का प्रस्ताव रखा गया है। इससे छात्रों को अपनी रूचि के अनुसार सभी वर्गों में से विषयों को चुनने का विकल्प मिलेगा, जिससे छात्रों की रचनात्मकता तो बढ़ेगी ही, साथ ही वैविध्यपूर्ण शिक्षा पद्धति को भी बढ़ावा मिलेगा। इस प्रकार की शिक्षा नीति की आवश्यकता काफी अरसे से महसूस की जा रही थी।
इस शिक्षा नीति का चैथा सकारात्मक पहलू यह भी है कि इसमें स्कूली पाठ्यक्रम में व्यावसायिक शिक्षा को भी शामिल करने का प्रस्ताव है। इसके माध्यम से समाज को विभिन्न क्षेत्रों में पारंगत कुशल व निपुण नागरिक मिल सकेंगे।
अब नजर डालते हैं उन पहलुओं पर जिन पर विचार-मंथन करने की महती आवश्यकता है और जिनके बगैर नई शिक्षा नीति अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में सक्षम नहीं हो सकती है। इसके लिए, हमें यह समझने की आवश्यकता है कि प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा ही समस्त शिक्षा पद्धति का मूल आधार है, जिनमें सरकारी व गैर-सरकारी दोनों प्रकार के स्कूल शामिल है। विडम्बना यह है कि सरकारी स्कूल अधिक खर्च के बावजूद अच्छे परिणाम नहीं दे पा रहे हैं जबकि प्राईवेट स्कूल सीमित संसाधनों व कम शैक्षिक योग्यता वाले शिक्षकों के बावजूद बेहतर परिणाम दे रहे हैं। आज हमें इसी विसंगति पर चिन्तन व मनन करने की आवश्यकता है। वास्तव में, सरकारी व निजी स्कूलों के शिक्षकों के बीच में यह अंतर उनकी जवाबदेही के कारण देखने को मिलता है। निजी स्कूलों के शिक्षक यदि अपने कर्तव्यों का सही ढंग से अनुपालन नहीं करते हैं तो उन्हें फटकार से लेकर नौकरी से बर्खास्तगी तक का सामना करना पड़ सकता है, जबकि सरकारी स्कूलों के शिक्षकों के साथ ऐसा नहीं है।
इसके परिणामस्वरूप, सीमित साधनों वाले माता-पिता भी आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की आस में अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ने के लिए भेज रहे हैं। आइये, इस तथ्य को समझने के लिए सरकार के डी.आई.एस.ई. (डाइस) के डेटा पर नजर डालते हैं। सत्र 2010-2011 से 2017-2018 के बीच सरकारी स्कूलों में होने वाले कुल दाखिलों में 2.38 करोड़ की गिरावट देखी गई, वहीं दूसरी ओर, निजी स्कूलों के नामांकन में 2.11 करोड़ की वृद्धि दर्ज की गई। इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि सरकारी स्कूलों से निजी स्कूलों में बच्चों के पलायन से सरकारी प्राथमिक विद्यालय लगातार खाली होते जो रहे हैं। 2017-2018 में देश के समस्त सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में से 68 प्रतिशत विद्यालयों में प्रति विद्यालय 100 से कम छात्र एवं औसतन मात्र 45 छात्र थे। अब, आप वर्तमान में सरकारी स्कूलों की स्थिति का अनुमान आसानी से लगा सकते हैं।
यहाँ यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि कई राज्यों में स्थिति अत्यन्त चिंताजनक है। डी.आई.एस.ई. आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2017-2018 में सरकारी प्राथमिक विद्यालय में औसत नामांकन हिमाचल प्रदेश में 34, उत्तराखंड में 39, जम्मू-कश्मीर में 40, मध्य प्रदेश में 63 जबकि उत्तर प्रदेश में 97 था।
यकीनन, राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 सरकारी स्कूलों के खाली होने व छात्रों की उपलब्धियाँ कम होने की समस्या को मानती तो है, परन्तु इसका समुचित समाधान नहीं प्रस्तुत करती है। नई शिक्षा नीति स्कूलों के एकीकरण, स्कूल परिसरों का निर्माण एवं अतिरिक्त शिक्षक प्रशिक्षण पर जोर देती है परन्तु जो मूलभूत समस्या है, उसका निराकरण नहीं करती है। मूल समस्या है सरकारी स्कूलों के शिक्षकों में जवाबदेही का अभाव। स्कूलों के एकीकरण से स्कूल खाली होने की प्रवृत्ति कम नहीं होगी और अतिरिक्त शिक्षक प्रशिक्षण का बेहतर परिणाम तब ही मिल सकेगा जब शिक्षक स्वयं उन कौशलों का उपयोग करें।
मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि यदि हम उपरोक्त तथ्यों व आंकड़ों से मुँह मोड़ेंगे तो हम फिर से छात्रों की एक नई पीढ़ी को खराब परिणामों के हवाले कर देंगे। यह तर्क कि हम नई शिक्षा नीति से इन कमियों को दूर कर देंगे, खोखला प्रतीत होता है, और वह भी ऐसे में जबकि हम शिक्षकों की जवाबदेही का समाधान खोजना दूर की बात है, हम इसे स्वीकारने में भी हिचक रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर बच्चों की कितनी और पीढ़ियों को इन सरकारी विद्यालयों को बचाने की विचारधारा की कीमत चुकानी पड़ेगी।
कठोर वास्तविकता यह है कि कम आयवर्ग के अभिभावकों को न चाहते हुए भी सरकारी विद्यालयों पर आश्रित रहना पड़ता है। वास्तव में, इन्हीं आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के कारण ही सरकारी स्कूलों को अस्तित्व शेष बचा हैं। ऐसे में, नई शिक्षा नीति की महती आवश्यकता यही है कि आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को सीधे तौर पर आर्थिक सहायता प्रदान कर इनके बच्चों को उपयुक्त विद्यालयों में शिक्षा प्राप्ति हेतु प्रेरित किया जाए। देश के करदाताओं को उनकी मेहनत की कमाई का सही मूल्य देने का समय अब आ गया है कि उन गरीब परिवारों को कुछ न्यूनतम धनराशि वाउचर के रूप में देने पर विचार किया जाए, जिससे वह अपनी पसन्द के स्कूल में अपने बच्चे का दाखिला करवा सकें। यदि हम एक सरकारी कर्मचारी को उसके बच्चे की शिक्षा के लिए प्रतिवर्ष 27000 रूपये दे सकते हैं तो कम आय वाले परिवारों को इस राशि का कुछ अंश देने से इंकार क्यों करें।




— लेखिका प्रो. गीता गाँधी किंगडन, यूनिवर्सिटी कालेज लंदन, यू.के. में एजूकेशन इकोनाॅमिक्स की प्रोफेसर हैं एवं श्री अरविन्द पानगढ़िया, कोलम्बिया विश्वविद्यालय, अमेरिका में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं।



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