आत्म निर्भर होता खिलौना उद्योग




डॉ श्रीकांत श्रीवास्तव
(लेखक भारतीय सूचना सेवा के अधिकारी है। लेख मे व्यक्त विचार उनके अपने निजी है।)

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘‘मन की बात’’ कार्यक्रम में कहा है कि खिलौने जहां एक और रचनात्मकता को बढ़ाते है वही आकाक्षाओं को भी उड़ान देते है। प्रधानमंत्री ने खिलौने उद्योग की ओर ध्यान देते हुए कहा कि इसमे अपार सम्भावनाएं निहित है और दुनिया के खिलौना बाजार में भारत एक महत्वपूर्ण भागीदारी निभा सकता है। दरअसल हमारे देश में खिलौना बनाने की प्राचीन परम्परा रही है। मिट्टी के रंग-बिरंगे खिलौने सदियो से बच्चों के मनोरंजन का साधन रहे है । घर में लड़कियां अकसर कपड़े के खिलौने बनाती रही है। उत्तरी भारत में गुड़िया एक ऐसा पर्व है जब लड़किया घरों में कपड़े की गुड़िया बनाती है और उसे तालाब में विसर्जित करती है। लकड़ी के खिलौने बनाना भारतीय काष्ठ कला में काफी महत्वपूर्ण स्थान पर रहा है। गांव में मेले लगते थे, आज भी लगते है । मेले में लकड़ी के बने तोते, गाड़ियां और अन्य खिलौने बिकते है। बच्चे इन्हे शौक से खेलते है। व्यवहार मनोविज्ञान के अनुसार खिलौना के विकासशील मस्तिष्क पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। जैसा कि प्रधानमंत्री जी ने गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर का उल्लेख करते हुए कहा कि जो खिलौने अधूरे होते है, वह काफी महत्वपूर्ण होते है, क्योकि उससे बच्चों को उन्हे पूरा करने की प्रेरणा मिलती है। यह प्रक्रिया उनके मानसिक विकास को बढ़ावा देती है।




प्रधानमंत्री जी की विशेषता चुनौतियो में अवसर तलाश करने की रही है। कोविड-19 के कारण लॉक डाउन के बाद उन्होने खिलौना उद्योग में एक बड़ी सम्भावना तलाशी। प्रधानमंत्री जी ने कहा कि दुनिया में खिलौना उद्योग का कारोबार सात लाख करोड़ रूपए का है। भारत के पास विरासत और विविधता दोनो है। इसलिए वह इस कारोबार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। केन्द्र सरकार ने खिलौना उद्योग को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए है। बाजार में चीन निर्मित खिलौनों की भरमार को देखते हुए यह बहुत आवश्यक था कि इस पर आयात शुल्क बढ़ाया जाए। सरकार ने देशी खिलौना उद्योग का सरंक्षण देने के उद्देश्य से खिलौने के आयात शुल्क पर 200 प्रतिशत की वृद्धि की है। नयी शिक्षा नीति ने भी खिलौनो पर विशेषरूप से ध्यान दिया गया है। खादी और ग्रामोद्योग की ओर से खिलौना बनाने का प्रशिक्षण देने की व्यवस्था की गयी है। कारीगरों को नियमित रूप से मिट्टी के खिलौने आदि बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है।

उत्तरप्रदेश में वाराणसी लकड़ी और मिट्टी के खिलौने के लिए मशहूर रहा है। यहां कश्मीरी मोहाल मे घर-घर लकड़ी के खिलौने और अन्य सामान जैसे सिघौरा, सोहगैला, संदूक आदि बनाने की पुरानी परम्परा रही है। लकड़ी के बने छोटे बर्तन जैसे कठवत आदि भी बड़ी संख्या में बनाए जाते है। बड़ी संख्या में कारीगर इससे जुड़े हुये है। लक्सा, केसरीपुर और रोहनिया मिट्टी के खिलौने को लेकर मशहूर रहे है। वाराणसी में सेवापुरी के रहने वाले खिलौना कारीगर नंदलाल विश्वकर्मा ने बताया कि दुर्गापूजा और गणेशपूजा जैसे पर्वो पर इन खिलौने की अच्छी बिक्री हो जाती है। वाराणसी में बने खिलौने का निर्यात भी किया जाता है। लक्खी मेलो के लिए मशहूर बनारस यानी वाराणसी खिलौना कारोबार को एक बड़ी बाजार मेले ठेले के जरिए उपलब्ध कराता है। बगल में स्थित चुनार चीनी मिट्टी के बने बर्तनों और खिलौने के लिए मशहूर है। कारीगर स्थानीय मिट्टी जिसे बोलचाल की भाषा में चीनी मिट्टी कहा जाता है उससे छोट-छोटे बर्तन और खिलौने बनाते है । उनको काफी पंसद किया जाता है। इसी तरीके से आजमगढ़ में निजामाबाद में काली मिट्टी के बने खिलौने मशहूर है। बाराबंकी में देवाशरीफ में भी काली मिट्टी के खिलौने बनते है। यहां के बने खिलौने और बर्तन दूर-दूर तक बिकने जाते है। इसके अलावा चित्रकूट में लकड़ी के खिलौने बनाने की पूरानी परम्परा रही है। इसे कुटीर उद्योग के रूप में शुरू किया गया है। कोरमा लकड़ी से बने ये खिलौने काफी सजीव लगते है। एक बहुत बड़ी आबादी इस खिलौना उद्योग मे रोजगार पाती है । झांसी का टेडीबियर उद्योग भी काफी मशहूर है और दूर-दूर तक इसकी ख्याती है।




उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ‘‘एक जिला, एक उत्पाद’’ की योजना शुरू की है। इसका काफी अच्छा प्रभाव देखने को मिल रहा है। योजना को 24 जनवरी 2018 को शुरू किया गया था। इसके काफी अच्छे परिणाम आये। योजना मूल रूप से प्रत्येक जनपद में परम्परागत ढ़ग से चले आ रहे उद्योगो को बढ़ावा देने के लिए बनायी गयी है। सरकार इन उद्योगो को नयी तकनीक से जोड़ रही है और इनसे जुड़े लोगो को प्रशिक्षण दिया जाता है। आर्थिक रूप से भी कम ब्याज दर पर इन उद्योगो से जुड़े लोगो को आर्थिक मदद दी जाती है। कारोबारियों को आसान शर्तो पर उपकरण भी दिये जाते है। सरकार का प्रयास है कि इनकी ब्रांडिग की जाये । खिलौना उद्योगो को इससे बढ़ावा मिलेगा। दरअसल यह क्षेत्र अभी तक उपेक्षित सा था। लेकिन अब सरकार ने इस ओर विशेषरूप से ध्यान दिया है। उत्तर प्रदेश में आगनवाड़ी केन्द्रो को प्री-प्राइमरी स्कूल के केन्द्र के रूप में विकसित करने की योजना है। यहां पर बच्चों को खिलौना मुहिया कराये जायेगे।

आत्मनिर्भर भारत बनाने की दिशा में खिलौना उद्योग को भी आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास है। प्रधानमंत्री जी ने लोकल खिलौने के लिए ओकल होने बात कही है। स्थानीय बाजार के साथ ही इन खिलौने के निर्यात पर भी ध्यान देना होगा। भारतीय खिलौना का अभी जिस पैमाने पर निर्यात हो रहा है वह पर्याप्त नही है क्योकि भारतीय खिलौने में कई ऐसी विशेषताएं निहित है, जो विदेशी, खासकर चीन निर्मित खिलौने में नही है। जिस तरीके से केन्द्र सरकार इस उपेक्षित खिलौना उद्योग पर ध्यान दे रही। उससे भविष्य में काफी संभावनाए दिख रही है।

आत्मनिर्भर भारत के लिए मेक इन इंडिया और मेड इन इंडिया की मानसिकता भी उत्पन्न करनी होगी। लोगो की मानसिकता और व्यवहार को बदलना होगा। उनको इस बात का अहसास दिलाना होगा कि भारतीय खिलौने कई मायने में आयतित खिलौने से काफी अच्छे है और भारतीय स्वाभिमान के साथ जुड़े है। इससे देश के एक बड़े तबके को रोजगार मिलता हैै और देश की अर्थव्यवस्था को गति मिलती है। भारतीय परम्परा में बने खिलौने बच्चों के मनोवैज्ञानिक विकास में सहयोग देते है।



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