कर्म व्यर्थ नहीं होता




अक्सर लोग कर्म और भाग्य के बारें में चर्चा करतें वक्त अपनें – अपनें जीवन में घट़ित घट़नाओं के आधार पर निष्कर्ष निकालतें हैं,कोई कर्म को श्रेष्ठ मानता हैं,कोई भाग्य को ज़रूरी मानता हैं,तो कोई दोनों के अस्तित्व को आवश्यक मानता हैं.लेकिन क्या जीवन में दोनों का अस्तित्व ज़रूरी हैं ? गीता में श्री कृष्ण अर्जुन को कर्मफल का उपदेश देकर कहतें हैं।
” कर्मण्यें वाधिकारवस्तें मा फलेषु कदाचन “
अर्थात मनुष्य सिर्फ कर्म करनें का अधिकारी हैं,फल पर अर्थात परिणाम पर उसका कोई अधिकार नहीं हैं,आगे श्री कृष्ण बतातें हैं,कि यदि मनुष्य कर्म करतें करतें मर जाता हैं,और इस जन्म में उसे अपनें कर्म का फल प्राप्त नहीं होता तो हमें यह नहीं मानना चाहियें की कर्म व्यर्थ हो गया बल्कि यह कर्म अगले जन्म में भाग्य बनकर लोगों को आश्चर्य में ड़ालता हैं। यही कारण हैं,कि आज भी लोग किसी उच्च पदासीन व्यक्ति के घर जन्म लेनें वालें व्यक्ति के विषय में यही राय रखतें हैं,कि ज़रूर पूर्व जन्म के कर्म श्रेष्ठ रहें होगें तभी ऐसे घर जन्म मिला अब ये अलग बात हैं,कि अपनें पूर्वजन्मों के कर्म को कोई व्यक्ति कायम नहीं रख पाता और अपनें कदाचरण के द्धारा अपना आगें का जीवन बर्बाद कर लेता हैं,जबकि कुछ लोग पूर्वजन्मों के कर्म को आगें बढ़ाकर और श्रेष्ठ जीवन व्यतित करतें हैं,किसी कहा भी हैं,कि “भाग्यवान को वही मिलता हैं,जो कर्मवीर छोड़कर गया था ” और फिर भाग्य चमकता भी कितनें का हैं, लाखों में किसी एक का जबकि कर्मवीर का तो भाग्योदय तय होता हैं।
जो कर्म शरीर द्धारा होता हैं वह कायिक या शारीरिक कर्म होता हैं,अपनें शरीर द्धारा किसी मनुष्य जीव – जन्तु को कोई चोट़ या आघात नही हो बल्कि सदैव शरीर दूसरों की भलाई के लिये तत्पर रहे यही कायिक कर्म होता हैं।
वाणी सदैंव मीठी रहनी चाहियें क्योंकि ” “बाण से निकला तीर और मुहँ से निकली बोली कभी वापस नहीं आती ” दुर्योधन के प्रति द्रोपदी का यह कथन कि ” अन्धों के अन्धे होतें हैं” ने महाभारत कि रचना कर दी और भारत भूमि की सभ्यता संस्कृति को बदल दिया,दूसरी और मीठे बोलों ने कितनें ही क्रोध को शांत किया हैं कहा गया हैं।
कागो काको धन हरै,कोयल काको देय ?मीठे वचन सुनाइ के,जग अपनो कर लेई ||
जब श्री राम ने परशुराम के आराध्य शंकर का धनुष प्रत्यांचा चढ़ानें के लिये झुकाया तो धनुष टूट गया इस पर आगबबूला परशुराम फरसा लेकर राम के पास गये और कहा कि किसनें मेरें आराध्य का धनुष तोड़ा हैं,वो मेरा सामना करें इस पर श्री राम ने कहा प्रभु में तो सिर्फ राम ही हूँ आप तो “परशुराम” हैं,मैं आपसे कैसें युद्ध कर सकता हूँ,इतना कहतें ही परशुराम का गुस्सा सातवें आसमान से सीधें जमीन पर आ गया और उन्होनें राम को गले लगाकर कहा राम तुम वास्तव में धनुष पर प्रत्यांचा चढ़ानें के अधिकारी हो,कहनें का तात्पर्य यही कि मधुरवाणी वीरो का आभूषण हैं।
तीसरा कर्म मानसिक कर्म हैं,मन में हम जो सोचतें हैं,विचार करतें हैं वही कायिक और वाचिक कर्म का आधार हैं,कहतें हैं,कि विचारों की शक्ति दूर बैठें व्यक्ति को भी प्रभावित करती हैं,यही कारण हैं,कि लोग प्रार्थना को ईश प्राप्ति का साधन मानतें हैं। वास्तव में हम सर्वाधिक कर्म मानसिक रूप में ही करतें हैं,इसलिए भारतीय मनीषी कहतें हैं,कि आदमी जैसा सोचता हैं,वैसा बन जाता हैं।






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न्यायाधीश, हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र

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